Category Archives: मेरी व्‍यंग्‍य रचनायें

सत्यवादी क्रांति

– विनोद विप्लव

भारत दिनों एक महान क्रांति के दौर से गुजर रहा है। वैसे तो हमारे देश और दुनिया में कई क्रांतियां हुयी हैं। मसलन औद्योगिक क्रांति, साम्यवादी क्रांति, समाजवादी क्रांति, पूंजीवादी क्रांति, और श्वेत एवं हरित जैसी रंगवादी क्रांतियां। लेकिन भारत में आज जिस क्रांति की लहर चल रही है उसकी तुलना में बाकी क्रांतियंा पसांग भर भी नहीं हैं। इसी महान क्रांति का असर है कि आज हर आदमी सच बोलने के लिये छटपटा रहा है। ऐसा लग रहा है कि मानो उन्होंने अगर सच नहीं बोला तो उनका दम घुट जायेगा, देश का बंटाधार हो जायेगा, धरती फट जायेगी और दुनिया रसातल में चली जायेगी। यही कारण है हर भारतीय सच बोलने का एक मौका देने की गुजारिष कर रहा है। लोग दिन-रात फोन करके गुहार लगा रहे हैं, ‘‘प्लीज, एक बार मुझे भी सच बोलने के लिये बुला लो।’’ लोग फोन करने के लिये इस कदर उमड़ पड़े हैं कि फोन लाइनें ठप्प पड़ गयी हंै। लोग रात में जाग-जाग कर फोन कर रहे हैं। सच बोलने के प्रति लोगों में ऐसा भयानक जज्बा इतिहास में शायद ही कभी देखा गया। वैसे भी हमारे देश में सच बोलने की परम्परा नहीं रही है। Continue reading सत्यवादी क्रांति

अकर्मण्ये वधिकारस्ते…..

राजस्थान में एक अच्छा काम हुआ लेकिन उस पर भी सवाल उठ गया। कुछ पढ़े-लिखे लोगों को गोलमा देवी का मंत्री बनना बर्दाष्त नहीं हुआ। इनका कुतर्क है कि जो महिला ‘‘लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर’’ है, वह काम क्या खाक करेगी। मानो जो पढ़े-लिखे हैं वे ही काम करते हैं और सही काम करते है।

हमारे देश में मुख्य दिक्कत काम नहीं करने की नहीं बल्कि काम करने की है। समस्या यह नहीं है कि लोग खास तौर पर मंत्री, नेता, अधिकारी और सरकारी कर्मचारी आदि काम नहीं करते, बल्कि रोना तो इस बात का है कि ये काम करते हैं। देष की तमाम समस्याओं की जड़ यह है कि जिन्हें काम नहीं करना चाहिये या यूं कहें कि जिनकी प्रकृति ‘‘कार्य विरोधी’’ है, वे काम करते हैं अथवा उन्हें काम करने के लिये मजबूर किया जाता है जबकि जिन्हें काम करना चाहिये अर्थात् जिनकी प्रकृति ‘‘कार्यसम्मत’’ है वे या तो काम नहीं करते या उन्हें काम करने नहीं दिया जाता। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि ‘‘कार्यविरोधी’’ प्रकृति के लोगों के कार्य करने का नतीजा देष और समाज के लिये विनाशकारी साबित हुआ है। Continue reading अकर्मण्ये वधिकारस्ते…..

Livelong worklessness!

कर्महीनता जिंदाबाद !
चुनाव के मौसम ने दस्तक दे दी है। काम के आधार पर वोट मांगने और वोट देने का परम्परागत पंचवार्शिक नाटक एक बार फिर दोहराया जाने लगा है। आपने देख लिया कि साठ साल से ‘‘काम के लिये’’ वोट देने का नतीजा क्या रहा। आज जरूरत ‘‘काम के लिये’’ नहीं बल्कि ‘‘काम नहीं करने के लिये’’ वोट देने की है। केवल उन्हीं उम्मीदवारों को वोट दिया जाना चाहिये कि जो ‘‘काम नहीं करने’’ का वचन दें। वोट देने से पहले उम्मीदवारों को ठोक-बजाकर परख लिया जाना चाहिये कि चुनाव जीतने के बाद वाकई वे काम तो नहीं करने लगेंगे। Continue reading Livelong worklessness!

ये भी हैं ऑस्कर के दावेदार

कांग्रेस ने ‘स्लमडॉग मिलिनेअर’ को ऑस्कर पुरस्कार दिए जाने पर अपनी पीठ थपथपाई। शुक्र है कि उसने संयम एवं शिष्टाचार का परिचय देते हुए केवल अपनी पीठ थपथपाकर संतोष कर लिया और चुप बैठ गई। अगर वह इस फिल्म के निर्माण में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए ऑस्कर पुरस्कार की मांग कर बैठती तो ऑस्कर अकैडमी वालों के लिए इनकार करना मुश्किल हो जाता। स्लगडॉग … के लिए ऑस्कर पुरस्कार पर एक तरह से उसका ही पहला हक है।

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यह बात और है कि कांग्रेस ने कर्म प्रधान पार्टी होने का परिचय देते हुए इस मुद्दे को तूल नहीं दिया। आज झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले हर फटेहाल व्यक्ति और हर नंग-धड़ंग बच्चे स्लमडॉग ….को ऑस्कर मिलने का सेहरा अपने सिर बांध रहे हैं और ऐसे दावे कर रहे हैं कि मानो अगर वे नहीं होते तो यह फिल्म बनती ही नहीं। कई ऐसे लोग भी अपने ही नाम का जयघोष कर रहे हैं, जिनका इस फिल्म से दूर-दूर का नाता नहीं है। दुर्भाग्य है कि मीडिया भी ऐसे लोगों के इंटरव्यू दिखाकर और छापकर इन्हें मुफ्त में प्रचार दे रहा है जबकि इनका इस फिल्म से कोई लेना देना नहीं है। Continue reading ये भी हैं ऑस्कर के दावेदार

Channel persons should dig a Pit in their Studio – A Satire by Vinod Viplav

चैनल वाले अपने स्टूडियो में ही कोई गड्ढा खोद लें

टीवी न्यूज चैनलों में काम करने वाले टॉप से बॉटम तक के लोग हमेशा बदहवास रहते हैं। टीआरपी बढ़ने-घटने के साथ इनका रक्त संचार घटता-बढ़ता रहता है। हमेशा इसी जुगाड़ में रहते हैं कि क्या दिखाएं ताकि टीआरपी बढ़े। समय-समय पर कुछ ऐसा घटता रहता है जिससे टीआरपी का जुगाड़ हो जाता है। पर यह जरूरी नहीं कि मुंबई में भयानक बारिश या आतंकी हमले, आरूषि कांड और चुनाव होते ही रहें। मुंबई हमले को नाकाम किए जाने और चुनाव बीत जाने के बाद चैनलों को टीआरपी का जुगाड़ करना कठिन होने वाला है। ऐसे में उनके लिये आसान नुस्खा पेश है।

(नोट- इस नुस्‍खे पर अमल से होने वाले परिणाम के लिए लेखक या पोर्टल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता)

कई दिनों से कोई बच्चा गड्ढे में गिरा नहीं। ऐसे भयानक समय में चैनलों को टीआरपी बढ़ाने के लिए तरह-तरह के जतन करने पड़ जाते हैं। जब बच्चा गड्ढे में गिरता है तो काम आसान हो जाता है। बच्चों को तो टेलीविजन वालों पर तरस खाते हुए हर सप्ताह कहीं न कहीं गड्ढे में गिरते रहना चाहिये। केन्द्र सरकार चाहे तो चैनल वालों की सहूलियत एवं उनके फायदे के लिये नियम बना दे कि हर राज्य सरकार को हर महीने कम से कम एक बच्चे के गड्ढे में गिरने को सुनिश्चित करना होगा। जिस राज्य में ज्यादा गड्ढे या बोर खुले छोड़े जायेंगे उसे केन्द्र से विषेश ‘खुला गड्ढा अनुदान‘ मिलेगा तथा उसे ‘सर्वाधिक बच्चा गिरावक राज्य‘ का दर्जा दिया जायेगा। ज्यादा से ज्यादा बोर होल खुला छोड़ने वाले कांट्रैक्टर को ‘टीआरपी रत्न‘ की उपाधि दी जायेगी। गड्ढे को खुला छोड़ने की प्रवृति को प्रोत्साहित करने के लिये सरकार को पद्म पुरस्कारों में ‘गड्ढा विभूषण‘, ‘गड्ढा  भूषण‘ और ‘गड्ढा श्रीजैसे पुरस्कारों को भी शामिल करना चाहिये। अब जब तक सरकार इस दिशा में कुछ नहीं करती, तब तक चैनल वालों को चाहिये कि वे खुद प्रयत्न करें और इस तरह की कुछ पहल करें। पिछले दिनों एक खबरिया चैनल में काम करने वाले मेरे एक दोस्त बता रहे थे कि आजकल बच्चे टेलीविजन चैनलों के ओबी वैन‘ को देखकर ही भाग खड़े होते हैं कि पता नहीं कब चैनल वाले उसे पकड़ कर किसी भी गड्ढे में डाल दें और इसके बाद वहीं से सीधा प्रसारण शुरू करें दें – ‘बच्चा फिर गड्ढे मेंसिर्फ ”परसों तक” चैनल पर।‘  गड्ढे में दो दिन तक भूखा-प्यास वह पड़ा रहे और टीआरपी चैनल की बढ़े। ऐसे में कोई बच्चा क्यों गड्ढे में गिरे?

इन चैनल वालों से यह तक नहीं होता कि किसी बच्‍चे को बिस्किटचाकलेटबर्गरजूसकोल्ड ड्रिंक्स आदि के पैकेट पकड़ायें और कहें कि बच्चा चल गड्ढे में उतर जा, जब तक इन सब आइटमों को खा-पीकर खत्म करेगा तब तक हम अपनी टीआरपी बढ़ा लेंगे और दो चार घंटे में दमकल और सेना वाले आकर तुम्हें निकाल लेंगे। बाद में ईनाम भी मिलेंगे और चैनलों पर इंटरव्यू आयेंगे,स्वयंसेवी संगठनों की गोरी मैडमें और चिल्‍ला-चिल्‍ला कर नाक में दम कर देने वाली टेलीविजन चैनलों की खूबसूरत बालायें गोद में उठायेंगी और बाइट लेंगी सो अलग। लेकिन चैनल वाले इतना भी नहीं करना चाहते।

अब सोचिये, किसी बच्चे के अपने आप किसी बोर या गड्ढे में गिरने के लिये कितना बड़ा संयोग बैठना चाहिये। बेमेल शादी कराने के लिये जन्मपत्री बनाने में किसी पंडित जी को जो मशक्कत करनी पड़ती है, उससे कई गुना अधिक मशक्कत ब्रह्मा जी को किसी बच्चे को बोर या गड्ढे में गिराने के लिये करनी पड़ती है। चलिये, यह तो मान लेते हैं कि कांट्रैक्‍टर बोर को खुला छोड़ देंगे क्योंकि यह तो उनका धर्म और जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन इसके आगे कितना बड़ा संयोग चाहिये क्योंकि केवल बोर या गड्ढे के खुला छोड़ देने भर से काम नहीं बनता। काम तब बनता है जब उसमें कोई बच्चा गिरे और चैनल वालों को इसकी भनक लगे। उस बोर या गड्ढे के आसपास बिलकुल बेपरवाह परिवारों और माता-पिताओं का भी होना जरूरी है जिन्हें इस बात कि फिकर ही नहीं रहती है कि उनका बच्चा खेलते-खेलते कहां निकल गया और कहां गिर गया। इसके अलावा वैसे परिवारों में ऐसे बच्चे का भी होना जरूरी है जो खेलने के लिये कहीं और नहीं, उस बोर के पास ही जाये और सीधे उसमें गिर जाये।

अब इतने सारे संयोग के लिये इंतजार करने से अच्छा है कि चैनल वाले अपने स्टूडियो में ही कोई बोर या गड्ढा खोद लें और हर सप्ताह किसी न किसी बच्चे को गिरने के लिये आमंत्रित करें। इसके अलावा स्टूडियो में लाइव डिस्कशन के लिये बच्चे के मां-बाप,पूर्व में गड्ढे में गिरने वाले किसी बच्चेउसके माता-पिताबोर को खुला छोड़ देने में माहिर कांट्रैक्टर आदि को पहले से बुला कर रखें। इससे ओवी वैन को कहीं मूव नहीं करना पड़ेगा। सब कुछ स्टूडियो में ही हो जायेगा। बोर यूं हो कि बच्चा एक तरफ से बोर में घूसकर दूसरी तरफ से निकल सके। साथ ही बोर में बच्चे के बैठनेखाने-पीनेसोने आदि की व्यवस्था होनी चाहिये। एसा होने से बच्चे बोर में ज्यादा से ज्यादा दिन रहेंगे और ज्यादा से ज्यादा समय तक टीआरपी बटोरी जा सकती है।

बोर से बच्चे को निकालने के नाटक को किसी कंपनी से प्रायोजित कराया जा सकता है। इसमें कंपनी का मुफ्त प्रचार होगा और वाहवाही भी खूब मिलेगी। यह नुस्खा सुपरहिट हो सकता है। अगर इस नुस्खे को आजमाया जाये तो सबका फायदा हो सकता है – चैनल वालों कोबच्चे और उसके मां-बाप कोप्रायोजक कंपनियों को और ‘सास-बहू‘ टाइप के दर्शकों को जो अपने चहते धारावाहिकों के बंद हो जाने से डिप्रेशन में चले गये हैं। सरकार और नेताओं को तो सबसे ज्यादा फायदा होगा क्योंकि आम लोग महंगाई और अन्य समस्याओं को भूल कर बच्चों को गड्ढे से निकाले जाने की चिंता में ही डूबे रहेंगे और सरकारमंत्री और नेता देश को गड्ढे में गिराने के मिशन को तसल्ली के साथ अंजाम दे सकेंगे।

यह व्‍यंग्‍य रचना भडास4मीडिया पर प्रसारित हो चुकी है। 

A satire based on Big Boss 2, socalled First TV Realty Show

 

बिग बॉस के बहाने

img_90401_bb2_sambhavna200808बिग बॉस के आलीशान और आरामदेह घर में तीन महीने रहने और उटपटांग हरकतें करने के बाद आशुतोष कौशिक एक करोड रूपये के ईनाम के विजेता बन गये। जिस दिन टेलीविजन चैनलों पर यह खबर दिन-रात दिखायी गयी उसके दूसरे दिन एक राश्ट्रीय अखबार में नेशनल सैंपल सर्वे आरगेनाइजेशन की एक सर्वे रिपोर्ट छपी कि भारत में 30 प्रतिशत से अधिक लोग अमरीकी कैदियों से भी कम जगह में रहते हैं और इनमें से ज्यादातर लोगों को रहने, सोने, रसोई, नहाने-धोने और शौच आदि के लिये औसतन 100 वर्ग फीट की जगह ही नसीब होती है। भारत में लाखों लोग जेल में नहीं होने के बावजूद ताउम्र कैद का जीवन व्यतीत करते हैं लेकिन बिग बॉस ऐसे लोगों पर मेहरबान नहीं होते। बिग बॉस के विजेता आशुतोष के पक्ष में जिन लोगों ने जिस जिन कारणों से वोट किया उनमें सबसे प्रमुख कारण यह था कि आशुतोष को पैसे की सख्त जरूरत है। ठीक है, हर आदमी को पैसे की जरूरत होती है। आशुतोष सहारनपुर में एक ढाबे के मालिक हैं और अगर उन्हें पैसे सख्त की जरूरत है तो फिर मुझ जैसे लोगों को पैसे की कितनी अधिक जरूरत होगी जो ढाबे तो क्या किसी भी चीज के मालिक नहीं है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद काफी लोगों ने माना कि उन्हें खुद तो नहीं लेकिन आशुतोष को पैसे की जरूरत है। ऐसे वोटरों से मेरी विनती है कि आशुतोष से कहीं अधिक पैसे की जरूरत मुझे है और अगर वे सभी अपनी तरफ से मुझे केवल उतने ही पैसे भेज दें जितने पैसे आशुतोष के पक्ष में एस एम एस करने में खर्च हुये तो मेरा कल्याण हो जायेगा। पैसे की जरूरत की तीव्रता और अधिक से अधिक समय तक किसी एक मकान में बंद रहने के आधार पर ही ईनाम देना हो इसके सही हकदार आषुतोश ही नहीं मेरे समेत और भी लाखों लोग हैं। पैसे की जितनी जरूरत आशुतोष को है उससे कम से कम एक करोड़ गुना अधिक जरूरत मुझे है और मुझसे भी कई करोड गुना जरूरत भारत में रहने वाले करोड़ों लोगों को है। ऐसे में होना तो यह चाहिये था कि लिये पदक, प्रशस्ति पत्र बगैरह-बगैरह तो आशुतोष को ही दे दिये जाते और एक करोड़ रूपये की नगदी मेरे और अन्य जरूरत मंदो के बीच बांटी जाती क्योंकि आषुतोश पर तो वैसे भी पैसों की बरसात होने वाली है। खैर अभी भी कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ा है क्योंकि बिग बॉस थ्री भी शुरू होने वाला है और मेरा निवेदन है कि उसमें मेरी बातों को जरूर ख्याल रखा जाये। वैसे अगर पूर्व मिस वल्र्ड और बिग बॉस के घर से पहले ही बेदखल हो जाने वाली डायना हेडन भी अगर चाहें तो हम जैसे लोगों की जरूरतें पूरी कर सकती हैं। डायना ने बिग बॉस के विजेता की घोषणा होने से कुछ दिन पूर्व कहा था कि उन्हें बिग बॉस के घर से बाहर निकल जाने का कोई मलाल नहीं है क्योंकि उन्हें और पैसे की उतनी जरूरत नहीं है और वह जब चाहें तब बहुत आसानी से एक करोड रूपये कमा सकती हैं। अगर ऐसा है तो उनसे मेरी प्रार्थना है कि हे, डायना। अगर आप आसानी से एक करोड़ रूपये कमा सकती हैं तो कमातीं क्यों नहीं हैं – अपने लिये नहीं तो मुझ जैसे गरीब लेखक के लिये कमाओ। अगर आप एक करोड रूपये कमा लें तो मुझे पूरा एक करोड़ देने के बजाय कुछ लाख या कुछ हजार रूपये ही दे दें तो मेरा काम फिलहाल चल जायेगा। बाकी के पैसे अगर आप खुद नहीं रखना चाहतीं तो अन्य जरूरतमंद भाइयों को दे दें, मुझे कोई एतराज नहीं होगा। ऐसा करने से आपको हजारों लोगों की दुआयें मिलेगीं और साथ ही साथ अगर आप भविष्य में बिग बॉस जैसी किसी प्रतियोगिता में शामिल होंगी तो यकीनन मेरा और मेरे जैसे हजारों लोगों के मूल्यवान वोट केवल और केवल आपको ही मिलेंगे। अगर डायना और आसानी से पैसे कमाने वाले अन्य लोग, जो शायद हजारों में नहीं तो सैकड़ों में तो होंगे ही, ऐसा करने लगें तो क्या भारत में गरीबी का नामों निशान होगा।

विनोद विप्लव

मोबाइल 9868793203