महाभारत धर्म युद्ध था या धन युद्ध था

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महाभारत का युद्ध अधर्म के खात्मे के लिए तथा धर्म की रक्षा के लिए किया गया जिसमें लाखों वीरों की बलि दी गई, लाखों महिलाएं विधवा हो गई, लाखों–करोड बच्चे अनाथ हो गए और लाखों माताओं की गोद सुनी हो गई।
कहा जाता है कि कौरव और खासतौर पर दुर्योधन और उसके पक्ष में लड़ने वाले अन्य लोग के प्रतीक थे और जिन लोगों ने दुर्योधन का साथ दिया वे अधर्मी थे और युद्ध में उनका नाश हो गया। दुर्योधन अगर गलत था और अधर्म के रास्ते पर था तो फिर क्यों कृष्ण ने अपनी सेना को क्यों दुर्योधन के पक्ष में लडने के लिए दे दिया और दुर्योधन की खातिर क्यों अपनी सेना खत्म हो जाने दिया।
क्या दुर्योधन अधर्म का प्रतीक था और इसलिए अधर्म पर धर्म की विजय के लिए महाभारत युद्ध हुआ और लाखों लोगों की मौत हुए, लाखों महिलाएं विधवा हो गई, लाखों बच्चे अनाथ हो गए। जो मारे गए वे केवल दुर्योधन के पक्ष में नहीं लड रहे थे वे भी मारे गए जो पांडवों के पक्ष में लड रहे थे। तो क्या इन लोगों का जो कौरव ⁄ दुर्योधन के पक्ष में युद्ध कर रहे थे वे ही मारे गए। तो चलिए मान लेते हैं कि वे सब अधर्मी थे इसलिए मारे गए। ऐसे में सवाल है कि कृष्ण की सेना के जो लोग दुर्योधन के पक्ष में युद्ध कर रहे थे वे भी अधर्मी थे। इसके अलावा पांडव के पक्ष में युद्ध करते हुए जो लाखों वीर मारे गए और जो महिलाएं विधवा हो गए, जो बच्चे अनाथ हो गए उनका क्या दोष था। वे तो धर्म के साथ थे तो फिर वे क्यों मारे गए। कृष्ण ने क्यों केवल अर्जुन को बचाने के लिए ही हर तरह का जतन किए बल्कि कई जगहों पर छल किया या छल करवाया। उन्होंने तो अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और पांडव – द्रौपदी के पुत्रों को भी नहीं बचाया। क्या वे सभी अधर्मी थे।

सबसे बडा सवाल यही है कि क्या यह युद्ध धर्म की रक्षा और अधर्म के खात्म के लिए हुआ था अथवा धन के लिए हुआ था। अगर दुर्योधन आधा राज्य पांडवों को दे देने के कृष्ण के प्रस्ताव को सहर्ष मान लेता तब भी क्या अधर्म के खात्मे के लिए युद्ध होता। अगर दुर्योधन अधर्मी था और उसका खात्मा जरूरी था तो वह क्यों यह प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास गए थे कि अगर आधा राज्य नहीं दे सकते तो पांच गांव ही दे दो। क्या अगर दुर्योधन पांच गांव दे देने पर राजी हो जाता तो वह अधर्मी या अधर्म का प्रतीक नहीं रहता और फिर महाभारत का युद्ध नहीं होता। क्या यह युद्ध धर्म के लिए हुआ था या धन के लिए। अगर धन कोई मामला नहीं था तो कृष्ण क्यों पांडव का दूत बन कर गए थे और जब वह दूत बन कर गए और जब दुर्योधन ने कुछ भी देने से मना कर दिया बल्कि कृष्ण को बांधन की कोशिश करने लगा तो कृष्ण अपना विराट स्वरूप दिखाकर ही लौट आए। जब शिशुपाल ने कृष्ण का अपमान किया था तब तो सुदर्शन चक्र से उसका गर्दन काट दिया लेकिन जब दुर्योधन ने कृष्ण का अपमान किया तो केवल अपना विराट स्वरूप दिखा का लौट आए। क्यों नहीं उसी समय दुर्योधन का हाल शिशुपाल की तरह किया। इसके बाद लौटते समय कर्ण को समझाने लगे और पांडव से मिल जाने का प्रलोभन देने लगे। मतलब उन्हें उम्मीद थी कि दुर्योधन अगर कर्ण पांडव के साथ आ जाए तो दुर्योधन धन के बटवारे पर राजी हो जाएगा और पांडव को धन मिल जाएगा। तो क्या यह युद्ध केवल धन के लिए था। अगर अधर्म का विनाश करना होता तो दुर्योधन और उसका साथ देने वालों का वह खुद ही विनाश कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि युद्ध के लिए पूरी स्थितियां तैयार की और न केवल युद्ध के लिए स्थितियां तैयार की बल्कि यह कोशिश किया कि युद्ध हर हाल में हो और बड़ा से बड़ा हो। पूरे युद्ध की योजना कृष्ण ने बनाई – अर्थात कहां युद्ध होगा’ युद्ध में कौन कौन सी सेना किसके तरफ से लडेगी’ युद्ध के नियम क्या होंगे आदि’ आदि। तो वह यह प्रस्ताव क्यों नहीं रख सकते थे कि युद्ध केवल दुर्योधन और किसी पांडव पुत्र – भीम’ या अर्जुन या किसी और के बीच होगा और जो जीतेगा वह राज्य करेगा। लेकिन आखिर क्यों इस युद्ध में अधिक से अधिक राज्यों को इस युद्ध में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया।
कृष्ण तो भगवान थे वह अपनी शक्ति से दुर्योधन या कर्ण के मन को भी बदल सकते थे–और अगर मन को नहीं बदल सकते थे तो क्यों नहीं दुर्योधन को उसी तरह मार गिराया जिस तरह से उन्होंने कंस या शिशुपाल का वध किया था। एक दुर्योधन को हराने के लिए लाखों लोगों की बलि क्यों दी गई।

कृष्ण को महाभारत युद्ध के परिणाम के बारे में पता था तो उन्होंने युद्ध को रोकने के लिए कुछ क्यों नहीं किया’ बल्कि इस बात की हर जगह कोशिश की युद्ध हो और युद्ध में ज्यादा से ज्यादा व्यापक हो और ज्यादा से ज्यादा विनाश हो। युद्ध में हुए विनाश को देखकर कुंती’ द्रोपदी और सभी पांडव विचलित हो उठे थे लेकिन कृष्ण युद्ध में हुए विनाश से कतई दुखी नहीं थे बल्कि जायज ठहरा रहे थे। अगर युद्ध जायज था तो उन्होंने युद्धिष्ठितर को अपनी माता कुंती को श्राप देने से क्यों नहीं रोका जिन्होंने अपनी माता के बहाने पूरी नारी जाति को श्राप दे दिया।

अगर कृष्ण बिल्कुल पाक – साफ थे और उन्होंने सब कुछ सही और धर्म के अनुसार काम किया था तो क्यों उन्हें गंधारी का श्राप लगा अथवा उन्होंने क्यों गंधारी के श्राप को स्वीकार किया – क्या उनके मन में अपराध बोध था।

कई लोग कहेंगे कि यह तो ईश्वर लीला थी जिसे आम आदमी के लिए समझना मुश्किल है। क्या ईश्वर अपनी लीला मनुष्यों के विनाश के लिए ही क्यों रचते हैं। ईश्वर अपनी लीला मनुष्यों को बीमारियों’ कष्टो’ गरीबी और भूख से बचाने के लिए क्यों नहीं रचते। भारत में ३६ करोड देवी देवता हैं लेकिन सबसे ज्यादा बीमारी’ भूखमरी’ कष्ट’ अत्याचार’ बरीबी’ बदहाली भारत में ही क्यों है। अमरीका’ ब्रिटेन’ यूरोप’ जैसे देशों में जहां कोई देवी देवता नहीं है वहां इस कदर बदहाली’ गरीबी’ बीमारी’ भूखमरी’ अत्याचार और कष्ट क्यों नहीं है। क्या यह भी ईश्वर लीला है कि भारत सैकडों सालों तक गुलाम रहा। चीन में तो एक भी देवी–देवता नहीं है। या यूं कहें कि वहां के लोग तो किसी देवी–देवता को मानते ही नहीं। ऐसे में चीन को तो बर्बाद हो जाना चाहिए था। क्या यह ईश्वर लीला थी कि भारत पर हमेशा बाहरी हमलावरों ने हमला किया और वे सफल् होते रहे। वे भारत को लूटते रहे और भारत के लोगों पर अत्याचार करते रहे और ३६ करोड देवी देवता लीलाएं रचते रहे।

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