पड़ोसन की चाय

यह उन दिनों की बात है जब आईआईएमसी का कोर्स खत्म होने के बाद मैं और सत्येंन्द्र रंजन जनकपुरी में एक डीडीए मकान में बरसाती में रहते थे। छत पर एक कमरा बना हुआ था और कमरे के आगे थोड़ी सी खुली जगह थी जहां किसी-किसी दिन दोपहर को उसी मकान के बीच वाले फ्लोर (दूसरे फ्लोर) पर किराए पर रहने वाली एक छरहरी सी, गोरी सी और सुंदर सी पडोसन कपड़े डालने आती थी। वह अपने पति के साथ रहती थी। शादी हाल में ही हुई थी। सत्येंन्द्र रंजन उन दिनों जनसत्ता में नौकरी करते थे और इसलिए ज्यादातर दिन ड्यूटी पर चले जाते थे। सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, उस समय तक मेरी नौकरी नहीं लगी थी इसलिए ज्यादातर दिन घर पर ही होता था और हिन्दूस्तान, जनसत्ता आदि आदि अखबारों से एसाइनमेंट लेकर आता था और घर में रहकर लेख आदि लिखता था। एक या दो बार जब कपड़े डालने आयी तो क्या करते हैं और कहां के रहने वाले हैं टाइप की एक दो बातें हुई।
उन दिनों अक्सर अब्दुल माबूद वहां आ जाता था और एक-दो दिन रह जता था। उन्हीं दौरान रांची के पत्रकार नवीन सिन्हा जी, जो सत्येन्द्र रंजन के भाई के दोस्त थे, भी आए हुए थे और कुछ दिन उसी मकान में रह रहे थे। एक दिन संभवत रविवार को यूं ही गपशप में पड़ोसन की बात निकली तो सत्येंद्र रंजन ने कहा कि विनोद की पड़ोसन से दोस्ती है। नवीन सिन्हा जी ने कहा कि अगर दोस्ती है तो उसका कुछ प्रमाण मिले। उन्होंने कहा कि अगर मैं पड़ोसन के घर से पड़ोसन के हाथों बनी चाय सबके लिए लेकर आ जाउं तो वह मान जाएंगे। मैंने कहा कि अगर मैं ऐसा कर दूं तो। नवीन सिन्हा ने कहा कि अगर ऐसा हुआ तो वह अपनी तरह से सबको शानदार पार्टी देंगे। मैं कभी पड़ोसन के घर नहीं गया था लेकिन मैंने सोचा चलो, जो होगा देखा जाएगा। मैं सीढी से नीचे उतरा और उनके यहा चला गया। वहां जाने पर देखा कि उनके पति महोदय ड्राइंग रूम में बिस्तर पर लेटे हुए हैं। मैं सामने सोफे पर बैठ गया। मैंने कहा कि मैं उपर वाले मकान में रहता हूं। आप कैसे हैं। पता चला कि उन्हें वायरल बुखार है। मैंने कहा कि कोई जरूरत हो तो बताइएगा। फिर मैंने कहा कि मेरे यहां कुछ मेहमान आए हैं और गैस खत्म हो गई है। सो अगर चाय बन जाए …………………।

इतना कहते ही उन्होंने अपनी पत्नी को आवाज दी और कहा कि इनके यहां मेहमान आए हैं। पांच छह कप चाय बना दो। कुछ देरे में वह ट्रे में छह कप रखकर और थर्मस में चाय लेकर आई। मैं विजयी भाव के साथ जब चाय लेकर उपर आया। उस दिन दोपहर में नवीन सिन्हा जी ने सबको होटल ले जाकर पार्टी दी। उसी दिन कुछ देर बाद पडोसन ने मुझे बुलावाया और जहां उनके घर गया तो उन्होंने कहा कि उनके पति डाक्टर के यहां जा रहे हैं अगर मैं साथ चला जाउं अच्छा होता।

महानगर की ढेर सारी यादों में से एक मिठी याद यह भी है – पड़ोसन की चाय जैसी मिठी। अगर आप सबकी कोई खट्टी-मिट्ठी याद हो जरूर बताएं।

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