बचपन की यादें (पार्ट -1) 
सरमेरा से राजगीर
मेरे बचपन की ज्यादातर यादें राजगीर से ही जुड़ी है जहां मेरे बचपन का अधिकांश समय बीता और जो जीवन का संभवत सबसे खूबसूरत समय था। राजगीर में मैंने तीसरी कक्षा से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई की थी। उससे पहले की पढ़ाई गांव के स्कूल में की थी। गांव का स्कूल गांव के ही किसी व्यक्ति के दलान में लगता था। गांव में जो स्कूल था, उसकी कोई स्मृति अब मेरे मस्तिष्क में नहीं है। इतना याद है कि मैं स्कूल जाने के लिए घर से बस्ता लेकर निकलता था, अपने दलान (घर से बाहर घर के पुरूषों एवं मेहमानों के बैठने की जगह) में बस्ते को छिपाकर खेलने के लिए कहीं निकल जाता था-अलंग (नदी के दोनों तरफ बनाई गई मिट्टी की थोड़ी उंची और मोटी दीवार, जिसका उपयोग चलने-फिरने, बैठकर बतियाने और दिशा मैदान के लिए होता है) की तरफ या नदी के पार पेड़ो के बगान की तरफ।

गांव की इस तथाकथित पढ़ाई के बाद मैंने कुछ महीने सरमेरा में पढ़ाई की। यहां मेरे पिताजी ब्लाक में कर्मचारी थे और ब्लाक में ही एक क्वार्टर में हम रहते थे। इस क्वार्टर में कुल मिलाकर संभवत तीन कमरे थे और एक आंगन था। आंगन से एक दरवाजा लगा था जो क्वार्टर के पीछे खुलता था। यह दरवाजा आम तौर पर बंद ही रहता था क्योंकि पीछे दूर-दूर तक खेत ही नजर आता था। सरमेरा के बारे में कोई ज्यादा स्मृतियां नहीं है। इतना याद है कि स्कूल हमारे क्वार्टर से थोड़ी दूर पर था और जहां पैदल जाता था। क्वार्टर से बाहर निकल कर थोड़ी देर चलने एक बाजार आता था और बाजार में ही वह स्कूल था। इस बाजार के बारे में इतना याद है कि वहां एक आटा चक्की थी और वहां मां थैला में गेंहू भरकर देती थी जिसे पिसवाने के लिए आटा-चक्की जाता था। वहां एक बस स्टैंड नुमा जगह थी जिसके बारे में इतना याद है कि जब हम समान सहित सरमेरा से राजगीर जा रहे थे तो वहां क्वार्ट्रर के चार छह लोग भी आए थे। उनमें एक महिला को यह कहते हुए सुना कि हमलोग तो कभी कभार राजगीर जाकर कुंड में नहाते हैं, अब आप तो राजगीर में ही रहेंगे तो जब चाहे तब कुंड में नहा सकेंगे।
राजगीर एक ऐतिहासिक जगह थी और मुझे इस बात का गर्व था कि हम राजगीर में रहते हैं। मुझे याद है कि गांव में अपने बचपन के दोस्तों को राजगीर का महत्व बताने के लिए कहा था कि हम राजगीर में रहते हैं जो राजा का गृह है। राजगीर को राजगृह भी कहा जाता है।
राजगीर में मेरे पिताजी अंचलाधिकारी (सीओ) के तहत काम करते थे और वहां वह नाजिर थे। लोग उन्हें नाजिर बाबू कहते थे। उनका आफिस प्रखंड कार्यालय की मुख्य बिल्डिंग में नहीं था बल्कि उसके पास में ही स्थित एक छोटी सी बिल्डिंग में था जिसमें संभवत दो कमरे थे। एक कमरे में पिताजी का बैठते थे और दूसरा कमरा कोशागार था। जहां लोहे की मजबूत पेटियां थी और उसमें रूपए रखे जाते थे। उन रूपयों से कर्मचारियों को वेतन दिया जाता था और अन्य सरकारी कार्य में खर्च किया जाता था। उस बिल्डिंग में एक छोटा बरामदा था। उस कोषागार की रक्षा के लिए पुलिस गार्ड होते थे और हमेशा वहां कोई न कोई गार्ड तैनात होता था। गार्डों के रहने के लिए पास में ही एक बैरक बना था जिसमें तीन-चार कमरे थे। उस बैरक के बाहर पीपल का बड़ा सा पेड़ था जो सीमेंट के एक चबुतरे में बीच में स्थित था। कोषागार और चबूतरे के बीच एक कच्ची पतली रोड थी और रोड के पांच -छह कदम पर कोषागार था। जो गार्ड ड्यूटी में होते थे वे अक्सर इसी चबूतरे के पास खड़े होकर कोषागार की निगरानी करते थे। चबूतरे पर अक्सर ही कुछ न कुछ लोग बैठे होते थे। जिनमें से पुलिस के गार्ड भी होते थे जो चादर बिछा कर चबूतरे पर लेटते थे या बैठकर बतियाते थे। इसके अलावा क्वार्टरों में रहने वाले लोग ओर हम बच्चे भी वहां अक्सर जाते थे। हम बच्चों की उन गार्ड़ों से अच्छी पटती थी। ड्यूटी देने वाले गार्ड पुलिस की बर्दी में बंदूक लेकर खड़े रहते थे वहीं चहल-कदमी करते। रात में ड्यूटी देने वाले गार्ड अक्सर सावधान की मुद्रा में खड़े मिलते थे या चबूतरे के पास कुसी पैर बैठते थे। रात में जब भी कोई व्यक्ति ब्लाक (प्रखंड) कार्यालय परिसर में आता दिखता था तो गार्ड पोजिशन लेकर बंदूक तान कर जोरदार आवाज में पूछते थे, ‘‘सावधान। कौन है। आगे मत बढ़ना।’’
आपको दोस्त या दुष्मन कहना होता था। दुश्मन तो कोई नहीं कहेगा। अगर आपने कह दिया ‘‘दोस्त’’ तो गार्ड आगे आने देता था। अगर आपने दोस्त कहने में देर की तो दोबारा कड़कदार आवाज में कहते थे -‘‘कौन है। आगे नहीं बढ़ना।’’
इसके बाद भी आपने कुछ नहीं कहा तो तीसरी बार भी यह दोहराते थे। तीसरी बार उसमें यह भी यह भी जोड़ देते थे – ’’आगे नहीं बढ़ना। अगर नहीं बताया तो गोली चला दूंगा।’’
इसके बाद भी अगर आपने कुछ नहीं कहा तो चेतावनी देते थे – ‘‘गोली चला रहा हूं।’’
लोग कहते थे कि तीन बार पूछने के बाद भी अगर कोई जवाब नहीं देता था तो गार्ड गोली चला देता है। हालांकि मैं जब तक वहां रहा ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी गार्ड ने गोली चलाई हो। लेकिन गार्ड इतनी कड़कदार आवाज में पूछते थे कई बार लोग डर जाते थे और हड़बड़ा जाते थे। जो पहली बार आते थे उन्हें मालूम नहीं होता था कि क्या बोलना है। कुछ लोग एक दो बार पूछे जाने पर लड़खड़ा कर बता देते कि फलां के यहां जाना है।
मैं कई बार मामा या चाचा के साथ बाजार से या मेले से रात को लौटा तो गार्ड ने इसी तरह पूछा। एकाध बार के बाद मैं सीख गया कि क्या बोलना है। एक बार मामा के साथ आ रहा था तो गार्ड ने पूछा तो मामा ने दूसरी या तीसरी बार में बोला कि नाजिर बाबू के आदमी हैं। गार्ड ने फिर जाने दिया। वहां बैठे गार्ड ने समझाया कि पहले ही बता देते कि नाजिर बाबू के यहां जाना है। उसके बाद जब भी ऐसा मौका आया मैं हिम्मत जुटाकर जोर से बोल देता – ‘‘दोस्त।’’
जैसा कि मैंने पहले लिखा कि जब तक मैं वहां रहा गोली चलाने की कोई घटना नहीं हुइ। लेकिन एक बार पिताजी देर से घर लौटे तो बताया कि पटना में या कहीं और किसी गार्ड ने पूछा कौन है। लेकिन कुछ जवाब नहीं मिलने पर गोली चला दी और गोली लगने से कर्मचारी की मौत हो गई। (जारी…..

Advertisements