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क्या थी वो बरसात की रात,
वोह तो थी कयामत की रात।

जिंदगी और मौत  की उस जंग  में ,
खानी पड़ी जिंदगी को मात।  

टूट गयी साँसों की डोरी जब,
खामोश हुई आवाज़ तो खो गए गीत।
दर्द का सागर लहरा  उठा,
जब चिर निंद्रा में सो गया हमारा मीत।
टूटे हुए अरमानो की नाव ले चली,
एक तनहा मुसाफिर को करने सपुर्दे-खाक।
सफ़र रौशनी से भरा शुरू जो हुआ,
बढ गयी उसकी फरिश्तों में साख।

इंसा था वो उम्दा और,
और फनकार भी था अज़ीम।
तोड़ दी हर दिवार इंसानों के बीच की,
दोस्त या दुश्मन सभी थे उसे अज़ीज़।

देकर तब्बसुम अपना औरों को,
खुद पिया गमें-ज़हर उसने।
जिंदगी को निभाने की,
कला सिखादी मगर उसने।
ज़माने की हवा छु न पाई जिसे,
ऐसी थी उस पर संस्कारों की बरक़त।

मासूम सा, सलोना सा वो,
उस पैर थी खुदा की इनायत।
रहती दुनिया तक आते रहेंगे,
उसकी यादों से भीगे अनेकों सावन।

कभी भुला नहीं पाएंगे तुझे ऐ रफ़ी!
जो तेरे सानिध्य में गुज़रे वही पल है पावन।
तू कहाँ गया? तू कहीं नहीं गया मेरे दोस्त!

तू अब भी है, यहीं कहीं हमारे आस-पास,
तेरे अमर गीत है, तेरी मधुर आवाज़ है,
और तू है इधर दिल के बिलकुल पास।            
हमेशा, हमेशा  के लिए।।।     

— ओनिका  सेतिया
onika.setia@gmail.com

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