गीतोपदेश के आधार पर कहा जा सकता है कि हमारे देश में दो तरह के लोग हैं। पहले तरह के लोगों को केवल कर्म का अधिकार है। कर्म के फल पर उनका कोई अधिकार नहीं है, जबकि दूसरे तरह के लोगों का केवल फल पर अधिकार होता है, उनका कर्म पर कोई अधिकार नहीं होता है। अर्थात् पहले तरह के लोग केवल कर्म के अधिकारी होते हैं, उनके कर्म के फल के अधिकारी दूसरे लोग होते हैं। दूसरे तरह के लोग केवल फल के अधिकारी होते हैं, उन्हें कर्म करने का नहीं केवल फल पाने और खाने का अधिकार होता है।
इस तरह से समाज में दो वर्ग हैं – कर्मवीर ओर फलवीर और इन दोनों का ही महत्व है। अगर कर्मवीर नहीं होंगे तो समाज चलेगा नहीं और अगर फलवीर नहीं होंगे तो कर्मवीरों के कर्मों से भारी मात्रा में उत्पन्न होने वाले फलों को खायेगा कौन और अगर इतने सारे फल खाये बगैर रह जायेंगे तो समाज में भयानक सड़ांध पैदा होगी और समाज रहने लायक रहेगा नहीं। कर्मवीर कर्म करने के लिये ही बने हैं। वंश दर वंश निरंतर कर्म करते रहने के कारण उनमें कर्म का जीन या कीड़ा विकसित हो गया है। वे अगर कर्म नहीं करें तो उनका जीना मुहाल हो जायेगा। इनका पूरा जीवन कर्म को समर्पित रहता है। वे एक सेकेंड भी खाली नहीं रहते। मानो अगर वे काम नहीं करेंगे तो जलजला आ जायेगा। ऐसे कर्मवीर लोग खुद को ही नहीं अपने मातहतों को भी काम में झोंके रहते हैं।
कर्मवीरों की जीन में आराम करने का फैक्टर ही गायब होता है। कर्म करते रहना उनकी नियति नहीं, नीयत है, उनकी मजबूरी नहीं उनकी आदत है। अगर वे कर्म नहीं करें तो उन्हें अपच, मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और ब्लड प्रेषर जैसी बीमारियां हो जायेगी। जिस दिन वे काम करने से वंचित हो जाते हैं उस दिन उन्हें रात में नींद नहीं आती। यही कारण है कि कृष्‍ण से लेकर आधुनिक संत एवं उपदेशक फल की चिंता किये बगैर इन्हें निरंतर कर्म करते रहने की सलाह देते रहे हैं। क्योंकि अगर ये लोग कर्म छोड़ कर आराम करने लगेंगे तो इन्हें हजार तरह की बीमारियां घेर लेंगी जिससे व्यापक मानव श्रम एवं राष्‍ट्रीय संसाधनों की हानि होगी।
दूसरी तरफ फलवीर लोगों का जन्म खाने के लिये होता है। इनमें कर्म का जीन नहीं बल्कि केवल खाने और डकार लिये बगैर पचाने का जीन होता है। वंश दर वंश दूसरों के कर्मों का फल खाते रहने से इनका हाजमा इतना दुरुस्त हो जाता है कि वे सब कुछ हजम कर लेते हैं – करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले पुल, रेल पटरियां, सड़कें, बांध, भवन, राहत सामग्रियां और बड़ी-बड़ी परियोजनायें।
कई समाज विरोधी लोग सदियों से सुचारू रूप से जारी वर्ग विभाजन की इस व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। लेकिन इसमें जरा सा भी बदलाव देष को विनाश की ओर ले जायेगा। आप सोचिये कि जिन लोगों ने कभी कर्म नहीं किया, उन्हें अगर कर्म करने को कहा जायेगा तो उल्टा-पुल्टा काम करेंगे जिससे देष का कितना नुकसान होगा। इसी तरह से जिन लोगों ने कभी फल नहीं खाया, उन्हें अगर दूसरों के कर्मों के फल को भी खाने को कहेंगे तो वे कैसे पचायेंगे। वे तो अपने कर्मों का भी फल नहीं खा सकते। ऐसे में तो यही होगा कि ये लोग फलों को पचा नहीं पायेंगे और जगह-जगह उल्टियां करते फिरेंगे जिससे देश में गंदगी और बदबू फैलेगी।
– विनोद विप्‍लव

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