-अरुण कुमार मयंक

भारत में लोकतंत्र है .पर लोकतंत्र का यह कौन सा घिनौना रूप दृष्टिगोचर हो रहा है? जनता के वोटों के बल पर कुर्सी पर बैठने वाले नेताओं ने जनता के साथ बेहद  क्रूर मजाक किया है . यहाँ के शासकों ने  पूरे देश को महंगाई , बेरोजगारी , रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया है. देश के तमाम नेताओं को शरद पवार को चांटा  मारना नागवार लग  रहा है . पर इन नेताओं को यह नज़र  नहीं आ रहा है कि आखिर वो कौन सी परिस्थितियां आन पड़ी कि इस देश के एक नौजवान को केंद्रीय मंत्री पर थप्पड़ चलाना पड़ा ? देश के तमाम नेता आज ध्रितराष्ट्र बन गए हैं .  उन्हें हरविंदर का थप्पड़ नज़र आ रहा है, पर उन्हें देश की बद से बदतर होती हालत दिखायी नहीं दे रही है.

हरविंदर का थप्पड़ अलोकतांत्रिक है , लेकिन देश के आम आवाम रोज मारे जा रहे हैं. देश की लड़कियों को चुरा कर विदेशी हरम में भेजा जा रहा है . लोकतंत्र के चौथे प्रहरी को रोज सरे आम अपमानित किया जा रहा है. मुम्बई के खोजी पत्रकार जे डे की हत्या को महीने हो गए हैं.एक मामूली सर्टिफिकेट के लिए लोग  रोज सरकारी कार्यालयों का चक्कर काट रहें हैं . क्या यह सब लोकतंत्र है ? इन मुद्दों पर विपक्षी दल धरना ,जुलूस एवं उपवास कर इतिश्री कर लेते हैं . फिर सत्ता में पहुंचते ही वे भी वही सब करते हैं, जो पहले वाला शासक कर रहा था .
अन्ना ने जन लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली में  अनशन किया . देश के लोगों ने अन्ना के कंधे से कन्धा मिलाया . सभी लोगों ने समर्थन में पूरे देश में जुलूस निकाला , धरना दिया तथा उपवास कर देश को एकता के सूत्र में पिरो दिया . अन्ना के आमरण अनशन ने सभी राजनैतिक दलों की चूलें हिला दीं. येन- केन- प्रकारेण देश के तमाम दलों के नेताओं ने दिलासा दे कर अन्ना का अनशन तुडवा दिया. लेकिन संसद में तमाम दलों ने अन्ना के जन लोकपाल बिल को तोड़ मरोड़ कर समर्थन दिया . आजतक किसी ने खुलकर जन लोकपाल बिल को संसद से पारित करवाने के लिए ईमानदार कोशिश नहीं की . ऐसी हालत में देश को युवाओं को भगत सिंह की याद आ रही है. हताशा , निराशा और अंधकार  में हरविंदर को गूंगी -बहरी सत्ता को सुनाने के लिए और कुछ भी रास्ता नहीं दिखाई दिया. शायद यही वजह है क़ि हरविंदर को  शरद पवार को चांटा मारने के लिए मजबूर होना पड़ा . यदि हरविंदर का यह थप्पड़ गैरलोकतांत्रिक है,तो भगत सिंह का संसद में विस्फोट करना भी गैरलोकतांत्रिक ही कहा जा सकता है .उस समय ब्रिटिश हुक्मरानों ने भगत सिंह को आतंकवादी करार देकर जेल में डाल दिया था . और बाद में उन्हें फांसी दे दी. जेल में भगत सिंह ने डायरी लिखी. डायरी में उन्होंने साफ़ -साफ़ लिखा है क़ि कांग्रेस के नेतृत्व में देश को जो आज़ादी मिलने जा रही है,उससे देशवासियों का कतई भला नहीं होने वाला है. फर्क सिर्फ यही होगा क़ि देश की सत्ता गोरे फिरंगियों के हाथों से फिसलकर काले फिरंगियों के हाथों में चला जायेगा . भगत सिंह का यह फलसफा आज अक्षरश: सत्य और प्रासंगिक है.
हरविंदर मामले में अन्ना हजारे के बयान पर टिपण्णी करने वाले नेता पहले अपने गिरेबान में झांककर देखें. वे अपने कर्तव्यों का निर्वाह किस ढंग से कर रहे हैं ? लगता है कि अन्ना हजारे के आन्दोलन से देश के पारम्परिक शासकों ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है. वे  बिलकुल घबडा से गए हैं . उनकी कुर्सी अब खिसकती नज़र आ रही है . ऐसे नेताओं को दिन -रात सोते -जागते अन्ना का भूत पीछा करता रहता है . यही कारण है कि अन्ना के बयान पर वे उल्टी -सीधी प्रतिक्रिया व्यक्त  कर जनता को दिग्भ्रमित करने की फ़िराक में हैं . लेकिन अब ऐसा होने वाला नहीं है. जनता जान चुकी है कि भारतीय लोकतंत्र को फिर से गाँधी, पटेल और भगत सिंह की आवश्यकता आन पड़ी है. अन्ना के रूप में उन्हें अपना मुक्तिदाता मिल गया है. लोग उन्हें गांधी का नया अवतार मान रहे हैं.हरविंदर पंजाबी है. भगत सिंह भी पूंजाबी थे .यह भी एक संयोग ही है.और शायद भगत सिंह का नया अवतार  हरविंदर हो !

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