राजस्थान में एक अच्छा काम हुआ लेकिन उस पर भी सवाल उठ गया। कुछ पढ़े-लिखे लोगों को गोलमा देवी का मंत्री बनना बर्दाष्त नहीं हुआ। इनका कुतर्क है कि जो महिला ‘‘लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर’’ है, वह काम क्या खाक करेगी। मानो जो पढ़े-लिखे हैं वे ही काम करते हैं और सही काम करते है।

हमारे देश में मुख्य दिक्कत काम नहीं करने की नहीं बल्कि काम करने की है। समस्या यह नहीं है कि लोग खास तौर पर मंत्री, नेता, अधिकारी और सरकारी कर्मचारी आदि काम नहीं करते, बल्कि रोना तो इस बात का है कि ये काम करते हैं। देष की तमाम समस्याओं की जड़ यह है कि जिन्हें काम नहीं करना चाहिये या यूं कहें कि जिनकी प्रकृति ‘‘कार्य विरोधी’’ है, वे काम करते हैं अथवा उन्हें काम करने के लिये मजबूर किया जाता है जबकि जिन्हें काम करना चाहिये अर्थात् जिनकी प्रकृति ‘‘कार्यसम्मत’’ है वे या तो काम नहीं करते या उन्हें काम करने नहीं दिया जाता। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि ‘‘कार्यविरोधी’’ प्रकृति के लोगों के कार्य करने का नतीजा देष और समाज के लिये विनाशकारी साबित हुआ है।

कई मंत्री और अधिकारी जब तक कोई काम नहीं करते, महीनों तक दफ्तर नहीं आते, तब तक सबकुछ ठीक चलता है, लेकिन जब वे नियमित दफ्तर आने लगते हैं और काम करने लगते हैं तो जलजला आ जाता है। कई कंपनियां आर्थिक मंदी या घाटे के कारण नहीं बल्कि अधिकारियों के काम करने के कारण डूबी है।

जो अधिकारी एवं मंत्री समझदार एवं विकासप्रिय होते हैं वे दफ्तर जाते ही नहीं और अगर भूले-भटके से दफ्तर चले भी गये तो काम नहीं करते। केवल विनाशप्रेमी एवं विकासविरोधी लोग ही दफ्तर जाते हैं और काम करने का खतरनाक खेल खेलते हैं।

एक अधिकारी जो पहले तो मानसिक तौर पर ठीक-ठाक थे और अपनी कंपनी का भला भी कर रहे थे लेकिन अचानक पता नहीं उनपर क्या पागलपन सवार हुआ कि रोज दफ्तर जाने और काम करने पर आमादा हो गये। कंपनी का हित चाहने वाले अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि वे सैकड़ों कर्मचारियों के बीबी-बच्चों के पेट पर लात नहीं मारें। लेकिन वह मानें नहीं। नतीजा सामने था। कंपनी बंद हो गयी और सैकड़ों लोग सडक पर आ गये।

एक अन्य कंपनी के एक अधिकारी के बारे में कुछ सिरफिरे लोगों ने कंपनी के बाॅस से शिकायत कर दी कि वह कोई काम नहीं करते। इसका नतीजा हुआ कि उस अधिकारी का तबादला दूसरे शहर में कर दिया गया। उस अधिकारी ने कंपनी पर गुस्सा निकालने के लिये नयी जगह पर पहुंच कर काम करना शुरू कर दिया और इसका नतीजा हुआ कि छह माह के भीतर उस शहर में कंपनी के सारे व्यवसाय चैपट हो गये और उस शहर में कंपनी के कामकाज को बंद करके उस अधिकारी को वापस बुलाना पड़ा तथा उन्हें काम नहीं करने पर राजी किया गया।

जब मंत्रिगण भी कुछ नहीं करते हैं तो देश ठीक चलता रहता है लेकिन जब कुछ करते हैं तो देश विनाष की ओर जाने लगता है। अगर हिसाब लगाया जाये कि मंत्रियों ने काम करके कितनी बकवास परियोजनाओं को मंजूरी दी और उन परियोजनाओं के नाम पर कितने रुपये बर्बाद किये तो साफ हो जायेगा कि ऐसे मंत्रियों का लिख लोढा पढ पत्थर रहना ही देश हित में है।

देष के विकास के लिये मंत्रियों एवं अधिकारियों पर पांच-दस वर्शों के लिये काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिये लेकिन कुछ राश्ट्रविरोधी जनसंगठनों, मीडिया और लोगों के दबाव के कारण मंत्रियों और अधिकारियों को अपनी प्रकृति के विरुद्ध काम करना पड़ता है जिसका नतीजा विनाशकारी होता है। गनीमत यह है कि आज भी कई मंत्री इतने देशप्रेमी हैं एवं देश के विकास के प्रति समर्पित हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये अपनी प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाते। चाहे लाख उनके पुतले जलते रहें, उनके खिलाफ प्रदर्शन होते रहें और उनपर जूते चलते रहें, देश के हित में काम नहीं करने के अपने संकल्प से डावांडोल नहीं होते जबकि कमजोर और थाली के बैंगन टाइप के मंत्री एवं अधिकारी ऐसे दबावों के आगे झुक जाते हैं और काम करके देश का बंटाधार कर देते हैं।

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