कर्महीनता जिंदाबाद !
चुनाव के मौसम ने दस्तक दे दी है। काम के आधार पर वोट मांगने और वोट देने का परम्परागत पंचवार्शिक नाटक एक बार फिर दोहराया जाने लगा है। आपने देख लिया कि साठ साल से ‘‘काम के लिये’’ वोट देने का नतीजा क्या रहा। आज जरूरत ‘‘काम के लिये’’ नहीं बल्कि ‘‘काम नहीं करने के लिये’’ वोट देने की है। केवल उन्हीं उम्मीदवारों को वोट दिया जाना चाहिये कि जो ‘‘काम नहीं करने’’ का वचन दें। वोट देने से पहले उम्मीदवारों को ठोक-बजाकर परख लिया जाना चाहिये कि चुनाव जीतने के बाद वाकई वे काम तो नहीं करने लगेंगे।

देषहित में ऐसा किया जाना जरूरी है। दरअसल हमारे देश में मुख्य दिक्कत ‘‘काम नहीं करने की’’ नहीं बल्कि ‘‘काम करने की’’ है। समस्या यह नहीं है कि सांसद, विधायक, मंत्री आदि ‘‘काम नहीं करते हैं ’’, बल्कि रोना तो यह है कि ‘‘वे काम करते हैं’’। तमाम समस्याओं की जड़ ओर हमारे पिछड़ेपन का कारण यह है कि जिन लोगों को अपनी मूल प्रकृति के अनुरूप काम नहीं करना चाहिये वे अपनी प्रकृति के विरूद्ध या तो काम करते हैं अथवा उन्हें काम करने के लिये मजबूर किया जाता है।

अब तक के हमारे अनुभव एवं आंकड़े इस बात के गवाह है कि सांसदों, विधायकों और नेताओं के काम करने का नतीजा विनाशकारी होता है। जब ये लोग काम नहीं करते हैं तो देश ठीक-ठाक चलता रहता है और देष का विकास होता है लेकिन जब ये कुछ करते हैं तो देश विनाष की ओर जाने लगता है। अगर हिसाब लगाया जाये कि इन्होंने काम करके राजस्व और राश्ट्रीय संसाधनों की कितनी बर्बादी की है तो साफ हो जायेगा कि इनका ‘‘काम नहीं करना’’ ही देषहित में है।

मेरे विचार से तो कम से कम पांच साल के लिये और अधिक से अधिक हमेषा के लिये सांसदों, विधायकों, मंत्रियों आदि पर ‘‘कार्य प्रतिबंध’’ लगा दिया जाना चाहिये। जो लोग चुनाव जीतकर काम करें, उन्हें दोबारा चुनाव जीतने नहीं दिया जाना चाहिये। हालांकि आज कई सांसद और विधायक अपनी प्रकृति से अच्छी तरह वाकिफ हैं और वे देषहित की खातिर कोई भी काम नहीं करना चाहते हैं लेकिन कुछ राश्ट्रविरोधी जनसंगठनों, मीडिया और लोगों के दबाव के कारण इन्हें काम करना पड़ता है। इन पर इस तरह का दबाव डाला जाना देष के खिलाफ घोर साजिष है और इस बात की जांच करायी जानी चाहिये कि इन्हें काम करने के मजबूर किये जाने के पीछे कहीं देषविरोधी ताकतों, आई एस आई या सी आई ए का हाथ तो नहीं है।

गनीमत यह है कि आज भी कई सांसद, विधायक, मंत्री आदि इतने देश प्रेमी हैं एवं देश के विकास के प्रति इस कदर समर्पित हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये वे ‘‘काम नहीं करने’’ की अपनी मूल प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाते। लाख उनके पुतले जलते रहें, उनके खिलाफ प्रदर्शन होते रहें और उनपर जूते पड़ते रहें, वे देशहित की खातिर ‘‘काम नहीं करने’’ के अपने संकल्प से बिल्कुल डावांडोल नहीं होते हैं लेकिन कुछ कमजोर, संकल्प विहीन और थाली के बैंगन टाइप के सांसद, विधायक और मंत्री ऐसे दबावों और विरोधों के आगे टूट जाते हैं और काम करने लगते हैं जिससे देश का बंटाधार हो जाता है।

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