कांग्रेस ने ‘स्लमडॉग मिलिनेअर’ को ऑस्कर पुरस्कार दिए जाने पर अपनी पीठ थपथपाई। शुक्र है कि उसने संयम एवं शिष्टाचार का परिचय देते हुए केवल अपनी पीठ थपथपाकर संतोष कर लिया और चुप बैठ गई। अगर वह इस फिल्म के निर्माण में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए ऑस्कर पुरस्कार की मांग कर बैठती तो ऑस्कर अकैडमी वालों के लिए इनकार करना मुश्किल हो जाता। स्लगडॉग … के लिए ऑस्कर पुरस्कार पर एक तरह से उसका ही पहला हक है।

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यह बात और है कि कांग्रेस ने कर्म प्रधान पार्टी होने का परिचय देते हुए इस मुद्दे को तूल नहीं दिया। आज झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले हर फटेहाल व्यक्ति और हर नंग-धड़ंग बच्चे स्लमडॉग ….को ऑस्कर मिलने का सेहरा अपने सिर बांध रहे हैं और ऐसे दावे कर रहे हैं कि मानो अगर वे नहीं होते तो यह फिल्म बनती ही नहीं। कई ऐसे लोग भी अपने ही नाम का जयघोष कर रहे हैं, जिनका इस फिल्म से दूर-दूर का नाता नहीं है। दुर्भाग्य है कि मीडिया भी ऐसे लोगों के इंटरव्यू दिखाकर और छापकर इन्हें मुफ्त में प्रचार दे रहा है जबकि इनका इस फिल्म से कोई लेना देना नहीं है।

राजनीतिक पार्टियों, संगठनों, सरकारी विभागों, नगर निगमों और पुलिस महकमे का कोई नाम भी नहीं ले रहा है जबकि इनके योगदान के बगैर इस फिल्म की कल्पना भी मुश्किल थी। दूसरी तरफ देश के कई नेताओं ने बड़े-बड़े दावे नहीं करके यह साबित कर दिया है कि वे कथनी में नहीं, करनी में विश्वास रखते हैं। इस फिल्म के निर्माण को संभव बनाने में विभिन्न तरीके से योगदान करने वाले राजनीतिक दल, सरकारी विभाग, पुलिस, नेता, मंत्री एवं अधिकारी गण सचमुच महान हैं कि वे अपने योगदान की चर्चा तक नहीं कर रहे हैं। ऐसी महानता भारत में ही संभव है।

एक लेखक होने के नाते मुझे ऐसी महान पार्टियों, नेताओं और मंत्रियों की चुप्पी और कुछ फालतू लोगों का बड़बोलापन हजम नहीं हो रहा है। मेरा मानना है कि जिस तरह फिल्म के लिए डैनी बॉयल, ए. आर. रहमान और अन्य लोगों को ऑस्कर पुरस्कार दिए गए, उसी तरह राजनीतिक दलों, सरकारी विभागों, पुलिस, नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों को भी पुरस्कार दिए जाने चाहिए थे, जिनके कारण भारत ने विकास की उस बुलंदी को छू लिया है कि डैनी बॉयल जैसे फिल्मकारों को स्लमडॉग…. जैसी फिल्में बनाने की प्रेरणा मिलती है। कांग्रेस समेत विभिन्न पाटिर्यों ने देश के विकास एवं समृद्धि के लिए महान कार्य किए हैं उनके कारण ही भारत में स्लमडॉग….जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म के निर्माण के लिए अनुकूल माहौल तैयार हो सका और फिल्म की शूटिंग के लिए अनुकूल स्थितियां एवं दृश्य उपलब्ध हो पाए। भारत में विकास के इस सूरतेहाल का श्रेय केवल कांग्रेस को नहीं मिलना चाहिए, अन्य पार्टियों का योगदान भी कोई कम नहीं है।

यह भी सोचा जाना चाहिए कि नगर पालिकाओं, नगर निगमों और अन्य स्थानीय निकायों का इस फिल्म के लिए कितना योगदान है। पुलिस महकमे का रोल क्या किसी से कम है। ऑस्कर वाले चाहें तो वे एक आयोग गठित कर सकते हैं जो यह पता लगाएगा कि इस फिल्म को संभव बनाने में किनका कितना योगदान है। इसके अलावा अकैडमी को ऑस्कर पुरस्कारों की कई नई श्रेणियां भी शुरू करनी चाहिए ताकि राजनीतिक दलों, सरकारी विभागों, मंत्रियों एवं अधिकारियों को भी पुरस्कार मिल सके।

इस बार तो चलिए जो हो गया सो हो गया। अब आगे से सरकार के तमाम विभागों एवं राजनीतिक दलों को भारत को ऑस्कर स्तरीय फिल्मों के निर्माण के मुख्य केन्द्र के रूप में विकसित करने के काम में जुट जाना चाहिए। स्लमडॉग मिलिनेअर के जरिए दुनिया भर में भारत की जो भारी प्रसिद्धि मिली है, उसे देखते हुए यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि भविष्य में भारी संख्या में अंतरराष्ट्रीय फिल्मकार भारत आकर अपनी फिल्में बनाएंगे और उन्हें ऑस्कर में भेजेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में ज्यादा से ज्यादा झुग्गी झोपडि़यां बनेंगी। शहरी गरीबों की संख्या भी बढ़ेगी ताकि ऐसी फिल्मों के लिए चरित्र मिल सकें।

2 Mar 2009, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4214144.cms

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