A satire on Bush – George Bush should start a new Business

जॉर्ज बुश का नया रोजगार
विनोद विप्लव
bushbootcamp3_1206334cजॉर्ज बुश ने राष्ट्रपति पद से हटने से पहले ही अपने करियर की अगली पारी के बारे में संकेत दे दिया। अब दुनिया भर के नेता उनसे वह गुर सिखाने की गुजारिश कर रहे हैं, जिसका प्रदर्शन उन्होंने बगदाद में प्रेस कॉन्फरंस के दौरान किया था। ऐसी गुजारिश करने वालों में भारतीय नेताओं की संख्या सबसे ज्यादा है, जो मुंबई हमले के बाद से जूते पड़ने की आशंकाओं से सहमे हुए हैं। वे चाहते हैं कि समय रहते जनता की जूतेबाजी से बचने की कलाबाजी सीख लें और यह बुश से बेहतर कौन सिखा सकता है। कई नेताओं ने उनसे इस कलाबाजी का प्रशिक्षण देने के लिए इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी का सुझाव दिया है, जिस पर बुश गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

जॉर्ज बुश को भेजे ईमेल में एक भारतीय नेता ने यह पूछ लिया है कि क्या वह जूतेबाजी के साथ-साथ चप्पलबाजी से भी बचने की कला जानते हैं? उस नेता का तर्क है कि जूते की बनावट ऐसी होती है कि उसे फेंकना थोड़ा मुश्किल है इसलिए निशाना चूकने की संभावना होती है लेकिन चप्पल को ठीक निशाने पर फेंकना आसान होता है। इसके अलावा भारत में जूते की तुलना में चप्पल ज्यादा प्रचलित हैं और इसलिए यहां जूतेबाजी की बजाय चप्पलबाजी से बचने की कला सीखना ज्यादा जरूरी है। भारत के लिए एक खतरनाक बात यह है कि यहां काफी लोग खड़ाऊं पहनते हैं जिसे ठीक निशाने पर फेंका जा सकता है और अगर यह लग जाए तो फिर उठना संभव नहीं होता है।

जॉर्ज बुश ने अपने जवाब में कहा है कि वह जूतेबाजी के साथ-साथ चप्पलबाजी और खड़ाऊंबाजी से बचने की कला भी जानते हैं और उम्मीद है कि उन्हें शीघ्र ही इस कलाबाजी का भी प्रदर्शन करने का सुअवसर मिलेगा। जूतेबाजी एवं चप्पलबाजी से बचने की कला सीखने-सिखाने की योजनाओं की भनक लगने पर कुछ जनसंगठनों ने भी लोगों को सही तरीके से जूते एवं चप्पल फेंकने की कला सिखाने की योजना बना ली है। इधर कुछ विशेषज्ञों ने भविष्य में जूतेबाजी की घटनाओं में तेजी आने के मद्देनजर जूते की मांग बढ़ने की संभावना जताते हुए लोगों को शेयर खरीदने की बजाय अधिक संख्या में जूते खरीद कर रख लेने की सलाह दी है।

जूते के बढ़ते महत्व को कवि लोग भी स्वीकार रहे हैं। आज अगर अकबर इलाहाबादी होते तो वह भी यही लिखते ‘जब तोप मुकाबिल हो तो जूते निकालो।’ कई जानकारों का कहना है कि सद्दाम हुसैन ने अगर अमेरिकी सेना से मुकाबले के लिए तोपों, लड़ाकू विमानों और स्कड मिसाइलों की बजाय जूतों से काम लिया होता तो वह खुद को और इराक को नेस्तनाबूद होने से बचा ले जाते। खैर जो काम इराक के लड़ाकुओं, दुनिया भर के अखबारों, टेलीविजन चैनलों, बुद्धिजीवियों के लेखों और जन प्रदर्शनों ने नहीं किया वही काम एक जोड़ी जूते ने कर दिखाया।

बुश पर जूतेबाजी के बाद जूते की कारगरता एवं प्रभाव क्षमता जिस तरह से स्थापित हुई है, उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि आने वाले समय में दो देशों के बीच युद्ध में तोप की बजाय जूते चलेंगे। दो देशों के युद्ध में सैनिकों को लड़ाने की बजाय इन देशों के शासक एक दूसरे पर जूते फेंकें। जो जितना सधे तरीके से जूते फेंकेगा, वह विजेता होगा। इसमें अंपायर के तौर पर अन्य देशों के पर्यवेक्षक बुलाए जा सकते हैं या यह दायित्व संयुक्त राष्ट्र संघ भी अपने ऊपर ले सकता है। वह जूतेबाजी के लिए अंपायरों का पैनल गठित कर सकता है।

जूतों के ऐसे उपयोगों के प्रचलन में आने पर सोचा जा सकता है कि किस भारी पैमाने पर संसाधन बचेंगे। इससे दुनिया को बड़ी राहत मिलेगी। बुश साहब दूरदर्शी हैं। वह जानते हैं कि आने वाले समय में जब जूतेबाजी के जरिये राष्ट्रीय स्तर पर जनता और नेताओं के बीच तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों के बीच संवाद होगा, तो जूते से बचने की कला सिखाने का उनका व्यवसाय दिन दूनी रात चौगुनी गति से तरक्की करेगा।

यह व्‍यंग्‍य नवभारत टाइम्‍स में कांटे की बात कॉलम के तहत प्रकाशित हो चुका है। नवभारत टाइम्‍स के वेबसाइट पर यह आलेख देखने के लिये यहां क्लिक करें।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

w

Connecting to %s

Create a website or blog at WordPress.com

Up ↑

%d bloggers like this: