A satire on Greatness.

महानता का जुगाड़ 

द निया में दो तरह के महान होते हैं। पहले दर्जे के महान बिना कुछ किये महान होते हैं। ये जेनेटिकली महान हैं। ऐसे लोग महान होने के अलावा कुछ और नहीं होते। दूसरे दर्जे के महान वे होते हैं जो कुछ करके महान बन जाते हैं। ये प्रमोटेड अथवा जुगाडु महान हैं। महान बनने के लिये कुछ करना पड़े तो यह महानता का अपमान नहीं तो और क्या है? सच्चे महान तो जन्मजात होते हैं। वे मुंह में महानता का चम्मच लेकर पैदा होते हैं। ये लोग महान पैदा होते हैं, ताउम्र महान बने रहते हैं और महान रहते हुये स्वर्गलोक सिधारते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे गये गुजरे होते हैं जो जन्म से तो महान नहीं होते लेकिन कुछ न कुछ करके अथवा यूं कहें कि किसी न किसी तरह का जुगाड़ करके महान बन जाते हैं। सच्चे महान लोगों में लेखक भी होते है, अभिनेता भी होते हैं और नेता भी। सच्चे महान लेखक वे होते हैं जो जीवन भर में बिना कुछ लिखे महान बने रहते हैं जबकि कुछ नामुराद लेखक जीवन-भर लिख-लिख करके महान बनने का जुगाड कर लेते हैं। लिख कर महान बनना महानता नहीं है। सच्चे महान लेखकों को तो नहीं लिखने पर फक्र होता है। जो वाकई महान हैं वे क्यों लिखें, लिखें तो वे जो महान नहीं हैं। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सभा-सम्मेलनों में ऐसे सच्चे महान मानवों के दर्शन होते हैं। ये लंबी -लंबी चमचमाती गाड़ियों से चलते हैं, इनके आगे-पीछे दो-चार लगुये-भगुये होते हैं, जहां-तहां पान की पीक थूकते चलते हैं। ये जहां जाते हैं चैनलों के रिपोर्टर इनसे माइकल जैकसन, माराडोना और बिपाषा बसु से लेकर बलात्कार, हत्या और अपराध जैसे विशयों पर बाइट लेते हैं, केवल उन विशयों पर बाइट नहीं लेते जिनमेंं में वे महान होते हैं। ऐसे ही एक माहौल में मैने किसी से पूछा कि फलां महान सज्जन ने ऐसा क्या किया है कि वे महान हैं। किसी ने मुझे दुत्कारे हुये कहा कि वह महान हैं, बस। कुछ करने से आदमी महान थोड़े ही बन जाता है। सच कहा। कुछ करने से लोग अगर महान बनने लगें तो हर गली-मोहल्ले में महानों की लाइन लग जायेगी। बिना लिखे या बिना कुछ किये जो महान होते हैं वे अकादमियों के अध्यक्ष, सभापति आदि पदों को सुशोभित करते हैं जबकि लिख-लिख कर महानता का जुगाड़ करने वाले दूसरे दर्जे के लेखक तो जीवन भर अपनी किताबें छपवाने और रायल्टी पाने के लिये प्रकाशकों के यहां चक्कर लगाते-लगाते और बसों में धक्के खाते हुये और रोजी-रोटी की जुगाड़ के लिये अपने मालिकों की गालियां खाते हुये मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं।

उपदेश – इससे यह सीख मिलती है कि महानता कुदरत की देन है जिसे हासिल करने की कोशिश करने का नतीजा बुरा होता है।

यह व्‍यंग्‍य दैनिक हिन्‍दुस्‍तान में प्रकाशित हो चुका है। 

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