Dangerous Television

 

                                  हत्‍यारे टेलीविजन चैनल

                                  – विनोद विप्‍लव

खबरिया चैनलों पर अक्सर हम हत्यारी पुलिस, पापी पापा, हत्यारी सरकार और इसी तरह के ब्रेकिंग न्यूज देखने को मिलते हैं। लेकिन हाल के दिनों में लोग इस बात को महसूस कर रहे हैं कि खुद इलेक्ट्रॉनिक माध्यम हत्यारे बनते जा रहे हैं। हमने विषेशज्ञों से बातचीत करके इस सबंध में एक आलेख तैयार किया है जो आपके सामने पेश है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से किस तरह से समाज में हिंसा को बढ़ावा मिलता है, लेकिन हाल में कई चौंकाने वाली बाते सामने आयी हैं। इन बातों में प्रमुख यह है कि टेलीविजन चैनल समाज में लोगों में आत्महत्या की प्रवृति बढ़ा रहे हैं। दुनिया भर में चिकित्सकों, मनोविज्ञानियों और शिक्षाविदों के बीच इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है कि टीवी पर दिखाई जाने वाली हिंसा और अश्लीलता से हमारे मूल्यों का ह्रास और हमारी संस्कृति का पतन हो रहा है। इससे कई सामाजिक बुराईयां भी जन्म ले रही हैं। यही नहीं विशेषज्ञों द्वारा स्कूली बच्चों पर किए गए एक शोध में पता चला कि टीवी देखने की आदत से बच्चों के मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंचता है। यहां इस बात से कोई संबंध नहीं है कि टीवी पर क्या दिखाया जा रहा है बल्कि टीवी स्क्रीन से निकलने वाली कैथोड किरणें 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर भयानक प्रभाव डालती है। बाल मस्तिश्क को बबाZद करते चैनल बाल रोग चिकित्सक और सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ बिहेवियरल साइंसेज (सीआईबीएस) के निदेशक डाण् शैलैश पानगांओकर के अनुसार टीवी देखने से बच्चों के मस्तिष्क पर कभी न ठीक होने वाले दुष्प्रभाव पड़ते हैं। इस संस्था द्वारा मंथन के नाम से बच्चों पर दो वर्ष तक किए गए शोध के तहत स्पष्ट रूप से देखा गया कि टीवी से आने वाला विकिरण मस्तिष्क के हिस्सों पर बुरा प्रभाव डालता है। विशेष परीक्षणों में पाया गया कि टीवी देखते समय बच्चों के मस्तिष्क में घातक किस्म के रसायनों का सृजन होता है। डा. पानगांओकर बताते हैं,`इससे दायीं ओर का मस्तिष्क बहुत तेजी से सक्रिय हो जाता है जबकि बांयीं ओर का मस्तिष्क बिल्कुल निष्क्रिय हो जाता है। इससे अस्थिर व्यक्तित्व का निर्माण होता है। टीवी बच्चों में एकाग्रता की क्षमता और सहनशक्ति को कम करता है और इससे बच्चे के कुंठाग्रस्त या फ्रस्ट्रेशन का शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है। यह बच्चे की याददाश्त, विश्लेषणात्मक क्षमता और भावनात्मक नियंत्रणों को भी क्षीण करता है। हाल के शोधों से पता चलता है कि टीवी देखते समय बच्चों में एक अवचेतना की स्थिति उत्पन्न होती है। इस समय बच्चे की चेतना का स्तर मस्तिष्क के उच्च क्षमता क्षेत्र से अपेक्षाकृत निम्न क्षमता वाले क्षेत्र तक गिर जाता है। मस्तिष्क को बांये से दांये की तरफ सक्रियता से शरीर में इंडौरफिंस नामक रसायन की लहरें उठती हैं जो शरीर को प्राकृतिक रूप से शिथिल कर देती है। इंडौरफिंस की संरचना अफीम, हीरोइन, मॉिर्फन तथा कोडीन जैसे नशीले पदार्थ के समान होती है। डॉ. पानगाओंकर के अनुसार सबसे ज्यादा भयानक तथ्य यह है कि इससे होने वाली क्षति की पूर्ति या भरपाई नहीं की जा सकती। इससे केवल बचाव ही संभव है, उपचार नहीं। टीवी देखने से होने वाले खतरनाक नुकसानों के उपचार के लिए कोई दवा नहीं है। डॉ. पानगांवोकर अपनी पत्नी दीपाली और मनोविज्ञानी राजा आकाश की मदद से एक डाटा बैंक बना रहे हैं। अपने संस्थान में वे बच्चों पर महंगे-महंगे परीक्षण नि:शुल्क करते हैं। टीवी देखने के दूरगामी दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर उन्होंने स्कूलों, अभिभावकों के बैठकों और सामाजिक संगठनों में एक जन जागरण अभियान शुरू किया है। वे अभिभावकों का एक फोरम गठित कर रहे हैं जिसमें बैठकें आयोजित कर विचार किया जाएगा कि बच्चों को टीवी की लत से कैसे छुड़ाया जाए। श्री आकाश कहते हैं,`माता-पिता को यह देखना होगा कि उनके बच्चे टीवी से दूर रहें। मस्तिष्क में क्षति पहुंचाने के अलावा टीवी से उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी बीमारियां भी होती हैं। इसके अलावा यह बच्चे को अनुशासनहीन भी बनाता है। टीवी देखने के दुष्परिणामों से बचने का एकमात्र उपाय पढ़ने की आदत डालना है। अगर बच्चें दिन में दो-तीन घंटे किताबें पढ़ेंगे तो उनके मस्तिष्क की क्षति को रोका जा सकता है। लेकिन टीवी ने पढ़ने की आदतें खत्म कर दी हैं।´ अमेरिका, कैलिफोर्निया और एरिजोना में जिन माता-पिता के बच्चे 13 वर्ष से कम उम्र के हैं उन्हें नया टीवी खरीदने की इजाजात नहीं है। टीवी देखने की आदतें रोकने के लिए बच्चों में लगातार स्वास्थ्य परीक्षण किए जाते हैं। लेकिन भारत को अभी उस जागरूकता के स्तर तक पहुंचने में बहुत लंबा समय लगेगा।

आत्महत्या बढ़ा रहे हैं चैनल

टेलीविजन चैनलों, फिल्मों, एवं मल्टीपलेक्स मॉलों के कारण तेजी से बढ़ती शोहरत और दौलत होड तथा बाजारवाद एवं भोग विलास की संस्कृति लोगों में डिप्रेशन एवं आत्महत्या की प्रवृति को बढ़ा रही है। नयी दिल्ली के दिल्ली साइकियेट्रिक सेंटर विशेषज्ञों के निदेशक डा. सुनील मित्तल के अनुसार मनोरंजन, सूचना एवं ज्ञान का प्रभावशाली माध्यम मानी जाने वाली मीडिया एवं फिल्में लोगों में तर्क एवं विवेक की क्षमता को कुंद करने के साथ ही ऐय्यासी, विलासता और पश्चिमी संस्कृति को बढ़ा दे रही है जिसके कारण लोगों में मानसिक तनाव, कुंठा एवं डिप्रेशन पैदा हो रहे हैं और इनके परिणाम स्वरूप आत्महत्या की दर बढ़ रही है। टेलीविजन, फिलमों और अन्य आधुनिक माध्यमों के कारण तेजी से बढ़ते बाजारवाद ने छात्रों के बीच पैसे एवं कैरियर के प्रति लालसा को इस कदर बढ़ाया है कि ये छात्र परीक्षा या जीवन के किसी क्षेत्र में पिछड़ने के डर से आत्महत्या पर उतारू हो रहे हैं। महानगरों में छात्रों में यह प्रवृत्ति अधिक बढ़ रही है क्योंकि अन्य शहरों के मुकाबले बड़े शहरों में छात्रों पर बेहतर कैरियर और नौकरी हासिल करने तथा प्रतियोगिता की दौड़ में आगे बने रहने की दबाव सबसे अधिक रहता है। ताजा अनुमान के अनुसार दुनिया भर में जितनी आत्महत्यायें होती उनमें से दस प्रतिशत से अधिक आत्महत्यायें भारत में होती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में आत्महत्या की घटनाओं में आयी तेजी के कारण हमारा देश आत्महत्या के मामले में पहले नम्बर पर पहुंच गया है।

ध्यान देने योग्य कुछ बातें-

अच्छे कार्यक्रम देखने से बच्चे की सोच, व्यवहार और भाषा पर अच्छे प्रभाव पड़ सकते हैं । इसके बावजूद बच्चों के कार्यक्रमों को देखते समय अभिभावकों की मदद जरूरी है ताकि वे उससे ज्यादा से ज्यादा और अच्छा सीख सकें।

अच्छे कार्यक्रमों का चुनाव

ऐसे कार्यक्रम चुनें जो आपके बच्चे की उम्र और इच्छा के अनुरूप हो। कार्यक्रम देखे न कि टीवी।

बच्चों के साथ बैठकर कार्यक्रम देखें

जब भी संभव हो अपने बच्चों के साथ बैठकर कार्यक्रम देखें इससे आप कार्यक्रम समझने में बच्चों की मदद कर सकते हैं। कार्यक्रम के क्रियाकलापों में बच्चों के साथ मिल जाएं।,

जानकारी बढ़ाएं

किताबें पढ़ें और बच्चों के पसंदीदा कार्यक्रमों की थीम पर आधारित क्रियाकलापों को करें।

सक्रियता बढ़ाएं

बच्चों को समझाएं कि जो भी वह टीवी पर देखते हैं उसके अनुरूप वे गाकर और नाचकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें।

टीवी देखने का समय तय करें

बच्चों को घूमने, खेलने, बात करने, दूसरों के साथ मिलने-जुलने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय मिलना चाहिए। टीवी चलने के समय के बारे में स्पष्ट निर्देश दें और उसे बनाएं रखें।

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